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होशियारपुर/ यूटर्न/21 मार्च।वायव्य के वास्तु दोष व्यक्ति के जीवन में बड़ी से बड़ी धटना को त्वरित गति से घटित कर देते हैं ।सांसारिक व्यक्ति अचानक वैराग्य की तरफ मुड़ जाता है, परिवार के न चाहते हुए भी गृह त्याग कर सन्यासी बन जाता है, विवाह करने के लिए मना कर देता है । जीवन को एकाकी बना देता है। यह सब बातें व्यक्ति खुद नही करता है उस भवन की वास्तु ऐसा करवाती है जहां पर वह वास करता हैं। कहने ओर सुनने में थोडा अटपटा लगता है पर होता वही है जो भवन की वास्तु चाहती हैं। ऐसा मानना है अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त वास्तुविद एवं लेखक डॉ भूपेन्द्र वास्तुशास्त्री का ।जिस घर से कोई संन्यासी , बैरागी या सांसारिक जीवन को त्याग कर साधु संत, ओर वैरागी बना उस घर का वायव्य कोण दूषित होता है या वायव्य में द्वार दोष होता है। पश्चिमी दिशा बाहरी दोषों से पीड़ित होती हैं। नेरित्य बड़ा हुआ नीचा और ज्यादा दूषित होगा। इन दोषों के साथ ईशान का कट जाना घट जाना दूषित होना भारी निर्माण होना आदि दोष होते हैं । कहीं कही तो ऐसे भवनों में ब्रह्म स्थान में कोई कुंआ या गहरा खड्डा भी हो सकता है। कही घरों में व्यक्ति गुप्त साधक, तांत्रिक या रहस्मयी जीवन शैली अपना बैठता है, वहां पर नेरित्य दिशा संपूर्ण दूषित होगी। उपरोक्त दोषों में वायव्य दोष के लिए एक कहावत प्रचलित हैं "योगी भोगी और जोगी"। हमारा भवन हमारे भाग्य और भविष्य का निर्णायक होता है। सही वास्तु हमे जीवन में सही दिशा प्रदान करता है।जो प्राप्त है वही पर्याप्त है जैसी संतोषी जीवन शैली भी प्रदान करता है ।