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चंडीगढ़/यूटर्न/26 मार्च। नशा मुक्ति केंद्रों में दी जाने वाली दवा बुप्रेनोरफिन के वितरण को लेकर पंजाब सरकार की नीति पर Punjab and Haryana High Court ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने राज्य सरकार से कई अहम सवाल पूछते हुए तीन सप्ताह के भीतर विस्तृत हलफनामा दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि नीति की समीक्षा जारी है और जल्द ही संशोधित जवाब पेश किया जाएगा। सरकार ने स्पष्ट किया कि यह मामला सामान्य स्वास्थ्य सेवाओं से अलग है और ओपिऑइड पर निर्भर मरीजों के उपचार में इस्तेमाल होने वाली संवेदनशील दवा से जुड़ा है। अदालत में यह मुद्दा प्रमुखता से उठा कि पंजाब के सरकारी डि-एडिक्शन केंद्रों में हरियाणा और अन्य राज्यों के मरीजों को दवा देने पर रोक क्यों लगाई गई है। इस पर कोर्ट ने सवाल किया कि यदि इन केंद्रों को अस्पताल की श्रेणी में माना जाए, तो बाहरी मरीजों को उपचार से वंचित करना क्या उनके जीवन के अधिकार का उल्लंघन नहीं होगा। सरकार ने अपने पक्ष में दलील दी कि बुप्रेनोरफिन अत्यधिक संवेदनशील दवा है, जिसके दुरुपयोग की संभावना रहती है। पूर्व में आधार आधारित सत्यापन में गड़बड़ियों के मामले सामने आने के बाद अब बायोमेट्रिक और वेबकैम आधारित निगरानी व्यवस्था लागू की गई है। सरकार का कहना है कि अन्य राज्यों के मरीज दवा लेकर वापस चले जाते हैं, जिससे उनकी निगरानी करना मुश्किल हो जाता है। वहीं याचिकाकर्ताओं ने नई नीति को भेदभावपूर्ण बताते हुए कहा कि अब सरकारी केंद्रों में भी केवल पंजाब के निवासियों को ही दवा देने का प्रावधान किया गया है, जिससे जरूरतमंद मरीजों को उपचार से वंचित होना पड़ सकता है। सुनवाई के दौरान अदालत ने वर्ष 2021 में गठित समिति की सिफारिशों पर भी सवाल उठाए और पूछा कि उन पर अब तक क्या कार्रवाई की गई। कोर्ट ने पाया कि इस संबंध में राज्य सरकार के पिछले हलफनामे में स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई थी। इसके अलावा, इस मुद्दे से जुड़ी विभिन्न जनहित याचिकाओं जहां एक पक्ष निजी मनोचिकित्सकों द्वारा दवा वितरण का विरोध कर रहा है और दूसरा पक्ष इसकी अनुमति की मांग कर रहा है को भी एक साथ सुनने का निर्णय लिया गया है। हाई कोर्ट ने सभी मामलों को तीन सप्ताह बाद पुनः सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करते हुए राज्य सरकार को स्पष्ट और विस्तृत जवाब देने के निर्देश दिए हैं।