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अशोक सहगल लुधियाना यूटर्न 9 अप्रैल : हाल ही में यूटर्न टाइम्स में प्रमुखता से प्रकाशित समाचार 'पब्लिशर से कमिशन ही तय करती है क्या होगा बच्चों का सिलेबस शिक्षा के मंदिर नहीं बिजनेस सेंटर बन गए निजी स्कूल' के बाद लोगों की काफी प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं इसी बीच न्यू चंडीगढ़ में एक निजी स्कूल का मामला चर्चा में आ गया जिसमें एक महिला सब इंस्पेक्टर ने एक निजी स्कूलों में अपने बच्चों का सेक्शन चेंज करने के लिए अनुरोध किया जवाब में उसे प्रिंसिपल ऑफिस से धक्के मार के बाहर निकाल दिया यह विवाद आज चर्चा के विषय रहा पुलिस मामले की गहनता से जांच कर रही है लोगों का कहना है कि यह संस्कार स्कूलों में खास तौर पर निजी स्कूलों में ऐसे नहीं आए बल्कि इसमें प्रशासनिक तथा पुलिस अधिकारियों की शहर के अलावा नेताओं का संरक्षण भी होता है नहीं तो स्कूल बिजनेस में जुटे हुए लोग ऐसा नहीं करते क्योंकि व्यापार में ऐसा नहीं होता अधिकारियों व नेताओं के नाम पर होती है सीटे बुक अधिकतर निजी व पब्लिक स्कूलों में एडमिशन के समय अधिकारियों के नाम पर उन्हें ऑब्लाइफ करने के लिए सिम बुक रखी जाती हैं और उनकी सिफारिश पर बच्चों को भर्ती किया जाता है यह अलग बात है कि डोनेशन उनसे भी कम ही छोड़ी जाती है जब तक की अधिकारी स्वयं हस्तक्षेप ना करें अधिकारियों के अलावा पुलिस के उच्च अधिकारी तथा शहर के गण मान्य नेताओ के नाम पर सीटे आरक्षित होती है इसी तरह पब्लिक व कॉन्वेंट स्कूलों में उपरोक्त के अलावा चर्च से संबंधित पादरियों आदि की सिफारिशे एडमिशन में चलती रहती हैं इसके बाद रहेंगे इसके बाद रह गए बच्चों के अभिभावकों से सारी कसर व घाटा पूरा कर लिया जाता है इस धंधे के बारे में पहले लेख में काफी कुछ प्रकाशित हो चुका है जब अभिभावक प्रशासन के पास जाते हैं तो उनकी सुनवाई नहीं होती इन्हीं कारणो से स्कूलों के बाहर लोगों को धरने प्रदर्शन दिखाई देते हैं । कैसे सुधरेगा शिक्षक का मॉडल लोगों का कहना है कि अगर यही हालात बने रहेंगे तो शिक्षक का मॉडल कैसे सुधरेगा अविभावक तो अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलाना चाहते हैं परंतु शिक्षक का दृष्टिकोण स्कूलों के दिशा निर्देशों पर आधारित होता है जो कमीशन और व्यापार में लाभ के आधार पर तय किया जाता है स्कूलों ने अविभावकों की एक कमजोरी तो पकड़ ही ली है कि उनका बच्चा अंग्रेजी अच्छी बोलने लगे तो वह समझते हैं कि बच्चा पढ़ लिख गया । अविभावक चाहते हैं सरकार करे हस्तक्षेप बच्चों के पैरेंट्स चाहते हैं कि सरकार शिक्षा के क्षेत्र में चल रहे निजी व पब्लिक स्कूलों के मामले में हस्तक्षेप कर उनके दिशा निर्देश तय करें ताकि कोई भी स्कूल अपनी मनमानी न कर सके उनका कहना है कि शिक्षा का दायित्व सरकार का है सरकार अगर उसे पूरा नहीं कर पा रही तो कम से कम निजी स्कूलों पर अंकुश रखने के लिए दिशा निर्देश तय करें सन 2021 में भी सरकार द्वारा निजी व पब्लिक स्कूलों के लिए दिशा निर्देश जारी किए गए थे परंतु वह समय के साथ ही अलोप हो गए और एडमिशन में रखी आरक्षित सीटे और अधिकारियों व नेताओं की मातम कुर्सी करने उन्हें अपने कार्यक्रमों में अतिथि और मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित करने के बदले में मैं फिर से ऑब्लाईज्ड हो गए लगते हैं