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पंजाब के आईजी गौतम चीमा से जुड़े चर्चित मामले में मोहाली की विशेष सीबीआई अदालत ने मंगलवार को बड़ा फैसला सुनाते हुए सभी छह आरोपियों को बरी कर दिया। अदालत ने निचली अदालत द्वारा सुनाई गई दोषसिद्धि और सजा को निरस्त करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा है। इस मामले में 20 दिसंबर 2024 को विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत ने गौतम चीमा समेत अजय चौधरी, रश्मि नेगी, वरुण उत्रेजा, विक्की वर्मा और आर्यन सिंह को भारतीय दंड संहिता की धारा 120-बी, 186 और 225 के तहत दोषी ठहराया था। अब अपीलीय अदालत ने उस फैसले को पूरी तरह रद्द कर दिया है। अदालत ने क्या कहा विशेष सीबीआई अदालत ने अपने आदेश में कहा कि पुलिस रिकॉर्ड में कई अहम कड़ियां गायब हैं। गिरफ्तारी और हिरासत से ले जाने की स्पष्ट एंट्री मौजूद नहीं थी। पहचान परेड नहीं कराई गई और गवाहों के बयान भी एक-दूसरे से मेल नहीं खाते थे। यहां तक कि मुख्य गवाह भी अदालत में आरोपियों की पहचान नहीं कर सके। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि निचली अदालत का फैसला तार्किक रूप से टिकाऊ नहीं था, क्योंकि जिन तथ्यों के आधार पर गंभीर आरोप खारिज किए गए, उन्हीं तथ्यों पर अन्य धाराओं में दोषसिद्धि दे दी गई थी। इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने सभी आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। क्या था मामला मामला 26 अगस्त 2014 की रात का है। अभियोजन के अनुसार, पीसीआर टीम ने घोषित अपराधी सुमेध गुलाटी को मैक्स अस्पताल, फेज-6 से पकड़कर थाना फेज-1, मोहाली लाया था। आरोप था कि इसके बाद तत्कालीन आईजी गौतम चीमा अपने साथियों के साथ थाने पहुंचे और उसे पुलिस हिरासत से छुड़ाकर ले गए। आरोप यह भी था कि बाद में उसे दोबारा मैक्स अस्पताल ले जाकर एक कमरे में मारपीट की गई और वहां भर्ती एक महिला को शिकायत वापस लेने की धमकी दी गई। इसके बाद पुलिस टीम ने अस्पताल पहुंचकर सुमेध गुलाटी को दोबारा अपने कब्जे में लिया था। इस घटना के आधार पर 30 अगस्त 2014 को थाना फेज-1 में मामला दर्ज हुआ था। बाद में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के आदेश पर जांच सीबीआई को सौंपी गई। 40 से ज्यादा गवाह पेश सुनवाई के दौरान 40 से अधिक गवाह पेश किए गए, लेकिन अधिकांश अहम गवाह अपने बयानों से मुकर गए। कई गवाहों ने घटना की पुष्टि नहीं की और न ही किसी आरोपी की पहचान की। अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष अपना मामला साबित नहीं कर सका।