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बिशनपुरा डंपिंग ग्राउंड में सोमवार सुबह करीब 7 बजे लगी आग ने देखते ही देखते विकराल रूप धारण कर लिया। कूड़े के पहाड़ में दबी प्लास्टिक और अन्य ज्वलनशील सामग्री ने आग को ऐसा “ईंधन” दिया कि 12 घंटे से अधिक समय बीतने के बावजूद भी इस पर काबू नहीं पाया जा सका। सुबह से ही मौके पर फायर ब्रिगेड की गाड़ियां और टेंडर लगातार पानी डालते रहे, लेकिन आग बुझने के बजाय अंदर ही अंदर सुलगती रही और पूरे दिन जहरीला धुआं उगलती रही। शाम करीब 7 बजे तक भी हालात पूरी तरह नियंत्रित नहीं हो सके, जिससे प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आग का सबसे ज्यादा असर आसपास की रिहायशी सोसाइटियों में देखने को मिला। हवा में फैले काले और जहरीले धुएं ने लोगों का सांस लेना तक मुश्किल कर दिया। कई निवासियों ने आंखों में जलन, गले में खराश और सांस लेने में दिक्कत की शिकायत की। स्थानीय लोगों का कहना है कि डंपिंग ग्राउंड लंबे समय से बीमारी का अड्डा बना हुआ है, लेकिन प्रशासन हर बार केवल आग बुझाने तक ही सीमित रहता है और स्थायी समाधान की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाए जाते। विभाग के अधिकारी राजीव कुमार के अनुसार, आग सुबह लगी थी और कूड़े में मौजूद प्लास्टिक के कारण लगातार सुलगती रही। उन्होंने बताया कि फायर विभाग की टीमें मौके पर डटी हुई हैं और आग बुझाने के प्रयास जारी हैं। बड़ा सवाल यह है कि आखिर डंपिंग ग्राउंड में बार-बार आग क्यों लगती है। क्या कचरा प्रबंधन में लापरवाही इसकी वजह है या फिर प्रशासन खतरे को नजरअंदाज कर रहा है? पर्यावरण विशेषज्ञों के मुताबिक प्लास्टिक जलने से निकलने वाला धुआं बेहद जहरीला होता है, जिसमें डाइऑक्सिन जैसे खतरनाक तत्व शामिल होते हैं, जो लंबे समय में कैंसर और सांस संबंधी गंभीर बीमारियों का कारण बन सकते हैं। फिलहाल आग बुझाने का काम जारी है, लेकिन बिशनपुरा डंपिंग ग्राउंड एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर गया है कि क्या शहर को साफ रखने के नाम पर लोगों की सेहत से खिलवाड़ किया जा रहा है?