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राघव चड्ढा बहस के केंद्र में, परिवार तक कार्रवाई के मुद्दे ने बढ़ाई संवेदनशीलता | एंटी-डिफेक्शन कानून पर फिर उठे सवाल
नई दिल्ली: देश की राजनीति में इन दिनों एक नई बहस जोर पकड़ रही है—क्या कुछ मुद्दों को जानबूझकर “डिस्ट्रैक्शन” बनाया जा रहा है ताकि असली सवालों से जनता का ध्यान हटाया जा सके? इसी कड़ी में Raghav Chadha का नाम चर्चा के केंद्र में आ गया है। कुछ राजनीतिक विश्लेषक उन्हें एक ऐसे चेहरे के रूप में देख रहे हैं, जिनके जरिए बड़े मुद्दों से विमर्श को भटकाया जा रहा है, जबकि समर्थक इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हैं। इसी बीच Ashok Mittal, जो Lovely Professional University के संस्थापक हैं, उनके ठिकानों पर ईडी की छापेमारी ने सियासी तापमान और बढ़ा दिया है। आधिकारिक तौर पर इसे कानूनी प्रक्रिया बताया जा रहा है, लेकिन विपक्षी हलकों में इसे राजनीतिक दबाव की कार्रवाई के तौर पर देखा जा रहा है। मामले ने एक और संवेदनशील पहलू को जन्म दिया है—राजनीति में परिवार तक कार्रवाई पहुंचने का मुद्दा। लंबे समय से यह धारणा रही है कि राजनीतिक टकराव के बावजूद “परिवार को निशाना नहीं बनाया जाता”, जिसे एक अनकहा ‘गोल्डन रूल’ माना जाता रहा है। हालांकि हालिया घटनाओं ने इस परंपरा पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। इस पूरे विवाद के बीच अब नजरें फिर से Anti-Defection Law पर टिक गई हैं। 1985 में लागू इस कानून का उद्देश्य दल-बदल को रोकना था, लेकिन इसमें मौजूद ‘दो-तिहाई (2/3) मर्जर’ का प्रावधान आज भी बहस का विषय बना हुआ है। इस प्रावधान के तहत यदि किसी दल के दो-तिहाई विधायक एक साथ पार्टी बदलते हैं, तो उन्हें अयोग्यता से छूट मिल जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि कानून की सबसे बड़ी कमी यह है कि यह मुख्य रूप से निर्वाचित प्रतिनिधियों पर लागू होता है, न कि राजनीतिक दलों पर। यही कारण है कि चुनाव के बाद गठबंधन बदलने, सरकारें बनने और गिरने का सिलसिला लगातार जारी रहता है। Bihar, West Bengal और Tamil Nadu जैसे राज्यों के उदाहरण इस प्रवृत्ति को और स्पष्ट करते हैं, जहां चुनाव बाद राजनीतिक समीकरण तेजी से बदलते रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग यह भी मानता है कि यदि एंटी-डिफेक्शन कानून को राजनीतिक दलों पर भी समान रूप से लागू किया जाए, तो भारतीय राजनीति में स्थिरता आ सकती है और “चुनाव जीतो, फिर समीकरण बदलो” की प्रवृत्ति पर लगाम लग सकती है। फिलहाल बड़ा सवाल यही है—क्या देश की राजनीति असल मुद्दों पर केंद्रित है, या फिर जनता को वैकल्पिक बहसों में उलझाकर मूल प्रश्नों से दूर किया जा रहा है? आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह बहस केवल आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रहती है या किसी ठोस राजनीतिक और कानूनी सुधार का रास्ता खोलती है।