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चंडीगढ़ 03 March । पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव का असर अब भारत के बासमती निर्यात पर गहराने लगा है। निर्यातकों के अनुसार करीब 55 हजार करोड़ रुपये के बासमती कारोबार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है, जिसका सबसे बड़ा झटका पंजाब और हरियाणा को लग सकता है। दोनों राज्य मिलकर देश के कुल बासमती निर्यात का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा अरब देशों को भेजते हैं। पंजाब से 18 हजार करोड़ का निर्यात प्रभावित उद्योग से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, अकेले पंजाब से ही करीब 18 हजार करोड़ रुपये का बासमती सऊदी अरब, ईरान, यमन और दुबई जैसे बाजारों में जाता है। लेकिन ईरान और इज़रायल के बीच बढ़ते टकराव और क्षेत्रीय अस्थिरता के चलते शिपमेंट में देरी, भुगतान अटकने और बीमा लागत बढ़ने जैसी समस्याएं सामने आ रही हैं। बासमती निर्यात एसोसिएशन के प्रधान अशोक सेठी ने कहा कि बंदरगाहों पर माल अटका हुआ है और पिछले वर्षों का भुगतान भी समय पर नहीं मिला। निर्यातकों के सामने यह असमंजस की स्थिति है कि माल किस बाजार में भेजा जाए, क्योंकि समुद्री मार्गों पर जोखिम बढ़ गया है। सीआईएफ समझौतों पर सतर्कता भारतीय चावल निर्यातक संघ ने अपने सदस्यों को सलाह दी है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव को देखते हुए ईरान और खाड़ी देशों के लिए नए ‘लागत, बीमा और माल ढुलाई (CIF)’ समझौतों से फिलहाल बचें। ऐसे समझौतों में विक्रेता को खरीदार के बंदरगाह तक माल की लागत, बीमा और भाड़ा वहन करना पड़ता है। मौजूदा हालात में बीमा प्रीमियम और माल ढुलाई दरों में तेज वृद्धि से नुकसान की आशंका बढ़ गई है। निर्यात आंकड़े और गिरती उम्मीदें सरकारी एजेंसी कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास एजेंसी (एपीडा) के आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल से दिसंबर 2025 के बीच मध्य पूर्वी देशों को बासमती चावल का निर्यात 27,197 करोड़ रुपये रहा। प्रमुख खरीदारों में सऊदी अरब, ईरान, इराक, यूएई और यमन शामिल हैं। वर्ष 2024-25 में भारत ने करीब 60 लाख टन बासमती चावल का निर्यात किया था, जिसमें सबसे बड़ी हिस्सेदारी पश्चिम एशिया की रही। किसानों पर भी असर की आशंका पंजाब में राज्य सरकार धान की तुलना में बासमती की खेती को बढ़ावा देती रही है, क्योंकि इसकी रोपाई 15 जुलाई तक संभव होती है, फसल कम समय में तैयार हो जाती है और इसकी पराली पशुओं के चारे के रूप में उपयोगी होती है। लेकिन लगातार निर्यात प्रभावित होने से किसानों का रुझान बासमती की ओर कम हो सकता है, जिससे राज्य की फसल विविधीकरण नीति को भी झटका लग सकता है। उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में हालात जल्द सामान्य नहीं हुए तो पंजाब-हरियाणा के बासमती कारोबार को लंबी अवधि तक आर्थिक दबाव झेलना पड़ सकता है।