चंडीगढ़ 28 Feb : पीजीआई में मानवता की मिसाल 36 वर्षीय डेविंदर सिंह ने बचाईं चार जिंदगियां, दो को दी नई रोशनी रूपनगर (पंजाब) के 36 वर्षीय डेविंदर सिंह के परिवार ने उनके ब्रेन डेड घोषित होने के बाद अंगदान का निर्णय लेकर चार लोगों को नई जिंदगी और दो को नई रोशनी दी। इस प्रेरणादायक कदम से कुल छह लोगों का जीवन सीधे तौर पर प्रभावित हुआ है। डेविंदर सिंह, गांव सोलखियां, तहसील व जिला रूपनगर (पंजाब) के निवासी थे और पेशे से निजी कार्य करने वाले इलेक्ट्रिशियन थे। 21 फरवरी 2026 को उनका मोटरसाइकिल से एक्सीडेंट हो गया, जब उनकी बाइक को एक स्कूटी ने टक्कर मार दी। उन्हें पहले सिविल अस्पताल, रोपड़ ले जाया गया और बाद में गंभीर सिर की चोटों के चलते पीजीआई चंडीगढ़ रेफर किया गया।
डॉक्टरों के प्रयासों के बावजूद 25 फरवरी को उन्हें ट्रांसप्लांटेशन ऑफ ह्यूमन ऑर्गन्स एंड टिश्यूज एक्ट के प्रावधानों के अनुसार ब्रेन स्टेम डेड घोषित किया गया।
परिवार ने लिया साहसिक निर्णय
ब्रेन स्टेम डेथ की पुष्टि के बाद पीजीआई के ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर्स ने परिवार को अंगदान के बारे में संवेदनशीलता के साथ जानकारी दी। गहरे दुख के बावजूद उनकी पत्नी गुरप्रीत कौर और पिता अमर सिंह ने सभी अंग और ऊतक दान करने की सहमति दी। पीजीआई के निदेशक प्रोफेसर विवेक लाल ने परिवार के इस निर्णय को नमन करते हुए कहा,"अकल्पनीय दुख की घड़ी में इस परिवार ने मानवता को चुना। डेविंदर सिंह का अंगदान केवल एक चिकित्सीय प्रक्रिया नहीं, बल्कि आशा की अमर विरासत है। प्रत्येक दान किया गया अंग किसी के लिए नई जिंदगी, किसी परिवार के लिए नई उम्मीद है।"
अंगों का सफल प्रत्यारोपण
अंगदान के तहत फेफड़े, लिवर, अग्न्याशय (पैंक्रियास), दोनों किडनी और कॉर्निया निकाले गए। लिवर को (आईएलबीएस), दिल्ली भेजा गया, जहां 54 वर्षीय मरीज में सफल प्रत्यारोपण किया गया। फेफड़े गुरुग्राम स्थित ऑप्टिमस हॉस्पिटल में 72 वर्षीय मरीज को प्रत्यारोपित किए गए।
दोनों अंगों को समय पर पहुंचाने के लिए क्रमशः स्पाइसजेट और एयर इंडिया की उड़ानों के माध्यम से एयरलिफ्ट किया गया।
पीजीआई में ही 29 वर्षीय मरीज का एक साथ पैंक्रियास-किडनी प्रत्यारोपण (एसपीके) किया गया। 37 वर्षीय मरीज को दूसरी किडनी प्रत्यारोपित की गई।
दान की गई कॉर्निया से दो व्यक्तियों की दृष्टि बहाल की जाएगी। पीजीआई के मेडिकल सुपरिटेंडेंट एवं रोटो (नॉर्थ) के नोडल अधिकारी प्रोफेसर विपन कौशल ने बताया कि ब्रेन स्टेम डेथ प्रमाणन से लेकर अंगों की निकासी, आवंटन, एयर ट्रांसपोर्ट और प्रत्यारोपण तक हर प्रक्रिया पूर्ण पारदर्शिता और सम्मान के साथ की गई।“दुख में भी जीवन चुनें” शोकाकुल पिता अमर सिंह ने भावुक शब्दों में कहा,"कोई भी पिता अपने जवान बेटे की अर्थी नहीं उठाना चाहता। हम अपने बेटे को नहीं बचा सके, लेकिन दूसरों को जिंदगी दे सके — यही हमारे लिए संतोष है।"पत्नी गुरप्रीत कौर ने कहा,"वह सिर्फ 36 साल के थे, सपनों से भरे हुए। जब हमें बताया गया कि वे वापस नहीं आएंगे, तो सब कुछ थम गया। लेकिन हमने सोचा — अगर वे हमारे साथ नहीं रह सकते, तो दूसरों में जीवित रहें।" विशेषज्ञों के अनुसार, एक अंगदाता आठ तक लोगों की जान बचा सकता है और कई अन्य के जीवन में सुधार ला सकता है। डेविंदर सिंह के परिवार के इस साहसिक निर्णय ने यह साबित कर दिया कि गहरे शोक में भी मानवता की रोशनी बुझती नहीं, बल्कि और अधिक चमकती है।