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अमेरिकी संरक्षणवाद,रूस प्रतिबंध विधेयक 2025 और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से अलगाव: भारत-अमेरिका संबंधों व वैश्विक व्यवस्था पर गहराता संकट-एक समग्रविश्लेषण - Uturn Time
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अमेरिका क़े संभावित 500 प्रतिशत तक टैरिफ प्लान से भारत के फार्मास्यूटिकल्स टेक्सटाइल, ऑटो पार्ट्स,आईटी हार्डवेयर और स्टील जैसे क्षेत्रों पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। रूस प्रतिबंध विधेयक 2025 तथा भारत के नेतृत्व वाले अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन सहित 60 से अधिक वैश्विक संस्थाओं से अमेरिका के बाहर निकलने का निर्णय भारत के लिए चुनौती- एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र गोंदिया - वैश्विक राजनीति में अमेरिका की भूमिका सदैव निर्णायक रही है,किंतु डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिकी विदेश नीति एक बार फिर आक्रामक राष्ट्रवाद,संरक्षणवाद और बहुपक्षीय संस्थाओं से दूरी की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है। रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने वाला रूस प्रतिबंध विधेयक 2025 तथा भारत के नेतृत्व वाले अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (आईएसए) सहित 60 से अधिक वैश्विक संस्थाओं से अमेरिका के बाहर निकलने का निर्णय,ये दोनों घटनाएँ न केवल भारत-अमेरिका संबंधों में तनाव का कारण बन सकता हैं, बल्कि पूरी वैश्विक शासन व्यवस्था को भी गंभीर प्रश्नों के घेरे में खड़ा कर रही हैं।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि यह कदम भारत की रणनीतिक स्वायत्तता पर सीधा हमला माना जा सकता है,क्योंकि भारत ने यह निर्णय किसी राजनीतिक समर्थन के तहत नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर लिया हैं,(1)रूस प्रतिबंध विधेयक 2025:आर्थिक दबाव का नया हथियार बन सकता है,क्योंकि यह विधेयक एक द्वितीयक प्रतिबंध का उदाहरण है,जिसके अंतर्गत उन देशों को दंडित किया जा रहा है जो रूस से तेल और ऊर्जा संसाधन खरीद रहे हैं। भारत और चीन जैसे देश, जिन्होंने अपने ऊर्जा सुरक्षा हितों को प्राथमिकता देते हुए रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदा अब सीधे अमेरिकी आर्थिक दबाव के निशाने पर हैं। 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की धमकी किसी भी देश के निर्यात- आधारित क्षेत्रों को गहरा झटका दे सकती है। (2) भारत की ऊर्जा सुरक्षा बनाम अमेरिकी रणनीति-भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है और उसकी ऊर्जा जरूरतें तेजी से बढ़ रही हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद रूस ने भारत को सस्ता कच्चा तेल उपलब्ध कराया जिससे भारत की मुद्रास्फीति नियंत्रित रही और आर्थिक स्थिरता बनी रही। अब भारत के लिए यह नई चुनौती खड़ी हुई है साथियों बात अगर हम भारत के निर्यात पर संभावित प्रभाव को समझने की करें तो,यदिअमेरिका वास्तव में 500 प्रतिशत तक टैरिफ लागू करता है, तो इसका असर भारत के फार्मास्यूटिकल्स, टेक्सटाइल, ऑटो पार्ट्स, आईटी हार्डवेयर और स्टील जैसे क्षेत्रों पर पड़ सकता है। अमेरिका भारत का एक प्रमुख व्यापारिक साझेदार है और इस तरह के टैरिफ भारत की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को कमजोर कर सकते हैं। यह स्थिति वैश्विक व्यापार संगठन के मुक्त व्यापार सिद्धांतों के भी विपरीत है।अमेरिका द्वारा भारत और चीन को एक ही श्रेणी में रखना कूटनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।भारत,जो इंडो- पैसिफिक रणनीति में अमेरिका का प्रमुख साझेदार माना जाता रहा है,अब उसी दंडात्मक नीति का शिकार बन रहा है जोचीन के लिए अपनाई जाती है। यह दर्शाता है कि ट्रंप प्रशासन के लिए रणनीतिक साझेदारी से अधिक महत्व तत्काल अमेरिकी हितों का है। साथियों बात अगर हम अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन से अमेरिका का बाहर निकलनें की रणनीति को समझने की करें तो, 7 जनवरी 2026 को राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा हस्ताक्षरित मेमोरेंडम के तहत अमेरिका ने 60 से अधिक अंतरराष्ट्रीय संगठनों से अलग होने का निर्णय लिया, जिनमें भारतके नेतृत्व वाला अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधनभी शामिल है। यह कदम भारत के लिए केवल कूटनीतिक झटका नहीं, बल्कि वैश्विक जलवायु नेतृत्व के प्रयासों पर भी आघात है।क्योंकि आईएसए भारत का सॉफ्ट पावर और जलवायु नेतृत्व हैं,जिसकी स्थापना भारत और फ्रांस की पहल पर हुई थी और इसका उद्देश्य सौर ऊर्जा को बढ़ावा देकर विकासशील देशों को स्वच्छ ऊर्जा की ओर ले जाना है। यह संगठन भारत की सॉफ्ट पावर और ग्लोबल साउथ नेतृत्व का प्रतीक बन चुका है। अमेरिका का इससे बाहर निकलना जलवायु परिवर्तन के खिलाफ वैश्विक लड़ाई को कमजोर करता है।बता दें इंटरनेशनल सोलर अलायंस एक वैश्विक पहल है, जिसके 120 से अधिक देश सदस्य हैं, इसका उद्देश्य सौर ऊर्जा को बढ़ावा देकर जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करना है। इस संगठन की अवधारणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नवंबर 2015 में लंदन के वेंबली स्टेडियम में अपने भाषण के दौरान रखी थी,आई एसएए की औपचारिक शुरुआत 2016 में मोरक्को के माराकेश में हुई थी,अमेरिका नवंबर 2021 में इसका 101वां सदस्य बना था। साथियों बात अगर हम अमेरिका फर्स्ट’ बनाम वैश्विक जिम्मेदारी को समझने की करें तो व्हाइट हाउस का यह तर्क कि अंतरराष्ट्रीय संगठन अमेरिकी करदाताओं के पैसे का दुरुपयोग कर रहे हैं,अमेरिका फर्स्ट नीति का ही विस्तार है।किंतु वैश्विक चुनौतियाँ,जैसे जलवायु परिवर्तन,महामारी,मानवाधिकार और शरणार्थी संकट, किसी एक देश के प्रयासों से हल नहीं हो सकतीं। अमेरिका का बहुपक्षीय मंचों से हटना वैश्विक सहयोग की भावना को कमजोर करता है।यह पहली बार नहीं है जब अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से दूरी बनाई हो। इससे पहले वह संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद से बाहर हो चुका है,फिलिस्तीनी राहत एजेंसी की फंडिंग रोक चुका है, युनेस्को से अलग हो चुका है और डब्लूएचओ व पेरिस जलवायु समझौते से बाहर निकलने की घोषणा कर चुका है। ये सभी कदम अमेरिका के संस्थागत अलगाववाद को दर्शाते हैं।अमेरिका का इस तरह पीछे हटना वैश्विक शासन ढांचे में नेतृत्व का शून्य पैदा करता है, जिसे चीन, रूस या अन्य क्षेत्रीय शक्तियाँ भरने का प्रयास कर सकती हैं। यह बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को तो बढ़ावा देता हैकिंतु साथ ही नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को कमजोर भी करता है। साथियों बात अगर हम भारत- अमेरिका संबंधों में बढ़ते तनाव को समझने की करें तो हाल के वर्षों में भारत- अमेरिका संबंधों को रणनीतिक साझेदारी और स्वाभाविक सहयोगी के रूप में देखा गया था। रक्षा,प्रौद्योगिकी, क्वाड और इंडो-पैसिफिक जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों की नजदीकी बढ़ी थी। किंतु रूस प्रतिबंध विधेयक और आईएसए से अलगाव जैसे कदम इस रिश्ते में अविश्वास पैदा कर रहे हैं।भारत के सामने अब एक जटिल चुनौती है, एक ओर अमेरिका जैसे शक्तिशाली साझेदार के साथ संबंध बनाए रखना और दूसरी ओर अपनी रणनीतिक स्वायत्तता, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक दक्षिण के नेतृत्व को भी संरक्षित करना। भारत को संतुलित कूटनीति, वैकल्पिक बाजारों की खोज और बहुपक्षीय मंचों को मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ाने होंगे।अमेरिका के अलगाववादी रुख के बीच भारत के पास अवसर भी है। वह आईएसए ब्रिक्स, जी-20 और अन्य मंचों के माध्यम से विकासशील देशों की आवाज़ बन सकता है।यह स्थिति भारत को एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित कर सकती है। अतःअगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि बदलती विश्व व्यवस्था में भारत का मार्ग, अमेरिका द्वारा रूस प्रतिबंध विधेयक 2025 को मंजूरी देना और अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन जैसे मंचों से बाहर निकलना केवल द्विपक्षीय मुद्दे नहीं हैं,बल्कि ये पूरी वैश्विक व्यवस्था को प्रभावित करने वाले फैसले हैं।भारत के लिए यह समय चुनौतीपूर्ण अवश्य है,किंतु यह उसकी कूटनीतिक परिपक्वता और वैश्विक नेतृत्व क्षमता की भी परीक्षा है। बदलती विश्व व्यवस्था में भारत को संतुलन,आत्मनिर्भरता और बहुपक्षीय सहयोग के रास्ते पर चलते हुए अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करनी होगी। *-संकलनकर्ता लेखक-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र *