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दिल्ली , 23 दिसम्बर। 2026 में राज्यसभा की 75 सीटें खाली होने जा रही हैं, और यह सिर्फ एक नियमित चुनाव नहीं बल्कि भारतीय राजनीति के लिए संभावित गेम-चेंजर साबित हो सकता है। बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और उत्तर-पूर्वी राज्यों से आने वाले ये चुनाव न केवल पार्टी ताकत के पैमाने तय करेंगे, बल्कि आगामी विधायी एजेंडे और केंद्र-संघीय संबंधों पर भी गहरा असर डाल सकते हैं। विशेष रूप से बिहार और उत्तर प्रदेश में सीटों का खाली होना NDA और INDIA गठबंधन के बीच सियासी संतुलन पर असर डाल सकता है। बिहार में BJP और JD(U) की मजबूत स्थिति संभावित जीत की गारंटी देती है, लेकिन उपेंद्र कुशवाहा जैसे नेताओं की अनिश्चित वापसी से विपक्ष के लिए यह चुनौती और दिलचस्प हो जाती है। उत्तर प्रदेश की दस सीटें भी यही खेल तय करेंगी। महाराष्ट्र और कर्नाटक में स्थिति और जटिल है। महा विकास अघाड़ी और कांग्रेस के लिए यह चुनाव रणनीतिक परीक्षण है, क्योंकि शरद पवार और प्रियंका चतुर्वेदी की वापसी अनिश्चित है। वहीं, कर्नाटक में मल्लिकार्जुन खड़गे और एच.डी. देवेगौड़ा के रिटायर होने से कांग्रेस को अपनी पकड़ मजबूत करने का मौका मिलेगा, लेकिन विपक्ष का क्रॉस-पार्टी समर्थन इस समीकरण को चुनौती दे सकता है। राज्यसभा की ऊपरी सदन की सत्ता संतुलन केवल संख्या का खेल नहीं, बल्कि लंबी अवधि की नीति और विधायी दिशा तय करने का अवसर है। NDA और विपक्ष दोनों के लिए यह 2026 का चुनाव न केवल राजनीतिक बल्कि रणनीतिक महत्त्व रखता है। परिणाम चाहे जैसा भी हो, यह निश्चित है कि भारत की राजनीतिक तस्वीर पर इसका असर लंबी अवधि तक रहेगा।