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लेखक: अमनजीत सिंह (29.01.2026) ​जम्मू-कश्मीर में पुलिसिंग का इतिहास बहादुरी, बलिदान और नैतिक संकल्प का गवाह है। उन विरले अधिकारियों में से, जो उस समय अडिग खड़े रहे जब संस्थाएं खुद हमले के घेरे में थीं, डॉ. बलबीर सिंह बेदी, आई.पी.एस., पूर्व महानिदेशक पुलिस, जम्मू-कश्मीर, एक शाश्वत सम्मान का स्थान रखते हैं। एक निडर पुलिस अधिकारी, अद्वितीय गहराई वाले विद्वान और एक मानवतावादी नेता, डॉ. बेदी का जीवन ईमानदारी, बौद्धिक शक्ति और कर्तव्य के प्रति अटूट प्रतिबद्धता का प्रतीक था। उन्होंने एक असाधारण जीवन जिया ताकि दूसरे शांति से रह सकें। ​24 जनवरी 1992 जम्मू-कश्मीर पुलिस के इतिहास में सबसे दर्दनाक और निर्णायक दिनों में से एक है। उस दिन, जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन पुलिस महानिदेशक श्री जितेंद्र नारायण सक्सेना, आई.पी.एस. के कार्यालय में सुरक्षा बलों की एक उच्च स्तरीय बैठक चल रही थी। बैठक में अशोक पटेल (आई.जी., बी.एस.एफ.), एम.के. सिंह (आई.जी., सी.आर.पी.एफ.), राजन बख्शी (डी.आई.जी., कश्मीर) और वीराना एवाली (आई.जी.पी., कश्मीर) सहित वरिष्ठ अधिकारी शामिल थे। ​बैठक के दौरान डीजीपी कार्यालय में एक भयानक आतंकवादी विस्फोट हुआ। श्री जे.एन. सक्सेना गंभीर रूप से घायल हो गए और बैठक में शामिल सभी अधिकारियों को गंभीर चोटें आईं। यह हमला केवल हिंसा की एक घटना नहीं थी, बल्कि क्षेत्र में आतंकवाद के सबसे गंभीर चरण के दौरान सुरक्षा तंत्र के उच्च नेतृत्व पर सीधा हमला था। ​धमाके वाली जगह से चश्मदीद गवाही ​पूर्व एस.एस.पी. सरदार खान (उस समय के एस.एच.ओ. राम मुंशी बाग) याद करते हैं कि धमाके के समय, वह पास के एसपी सिटी कार्यालय में तत्कालीन एसपी सिटी श्री एस.एम. सहाय के साथ मौजूद थे। "धमाके की आवाज सुनते ही हम तुरंत डीजीपी कार्यालय की ओर भागे," सरदार खान ने याद किया। वहां जो उन्होंने देखा वह तबाही थी। बिना किसी झिझक के, उन्होंने गंभीर रूप से घायल डीजीपी श्री जे.एन. सक्सेना साहब को अपने कंधों पर उठाया, उन्हें नीचे लाए और 92 बेस आर्मी अस्पताल बादामी बाग पहुँचाया जहाँ आपातकालीन उपचार शुरू हुआ। अन्य घायल वरिष्ठ अधिकारियों को भी वहीं भर्ती कराया गया। इस धमाके ने पुलिस बल को भीतर तक झकझोर दिया और नेतृत्व के हौसले और निरंतरता के लिए एक गंभीर चुनौती पैदा कर दी। ​25 जनवरी 1992: डॉ. बी.एस. बेदी ने कार्यभार संभाला ​हमले के तुरंत बाद, 25 जनवरी 1992 को उत्तर प्रदेश कैडर के 1961 बैच के आईपीएस अधिकारी डॉ. बलबीर सिंह बेदी को नेतृत्व सौंपा गया। उन्होंने ऐसे समय में कार्यभार संभाला जब आतंकवाद न केवल व्यक्तियों को मारने की कोशिश कर रहा था बल्कि संस्थानों को पंगु बनाना चाहता था। ग्राउंड ऑफिसर्स, विशेष रूप से एस.एच.ओ. और डी.एस.पी. को अपने पहले संबोधन में, डॉ. बेदी ने एक स्पष्ट और दृढ़ संदेश दिया: ​"इस तरह काम करें जैसे कुछ हुआ ही नहीं। डर को अपने कर्तव्य के रास्ते में न आने दें।" ​एस.एस.पी. सरदार खान के अनुसार, जो उस समय एस.एच.ओ. के रूप में सेवा दे रहे थे, इन शब्दों ने पूरी फोर्स में तुरंत विश्वास बहाल कर दिया और यह स्पष्ट कर दिया कि जम्मू-कश्मीर पुलिस आतंकवाद के सामने पीछे नहीं हटेगी। ​डॉ. बेदी सिर्फ फाइलों और दफ्तरों तक सीमित रहने वाले नेता नहीं थे। उन्होंने सभी मोर्चों पर आगे बढ़कर नेतृत्व किया। सरदार खान याद करते हैं कि डॉ. बेदी श्रीनगर, करण नगर, निषाद, डाउनटाउन, राज बाग और अनंतनाग, पुलवामा, डोडा और किश्तवाड़ जैसे जिलों में बिना किसी विशेष सुरक्षा के अक्सर घूमते थे। उनकी उपस्थिति ने कर्मियों को भरोसा दिलाया और एक स्पष्ट संदेश दिया कि राज्य अपनी सत्ता का समर्पण नहीं करेगा। ​शैक्षणिक पृष्ठभूमि और करियर ​सियालकोट (अब पाकिस्तान में) में जन्मे डॉ. बेदी का परिवार विभाजन के बाद सरहिंद, पंजाब आ गया था। एक होनहार छात्र के रूप में, उन्होंने कई शैक्षणिक सम्मान जीते और अंग्रेजी साहित्य के प्रति जीवन भर का प्यार विकसित किया। भारतीय पुलिस सेवा में शामिल होने से पहले, उन्होंने लगभग तीन साल एक पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज में पढ़ाया एक असाधारण विशेषता जिसने पुलिसिंग के प्रति उनके बौद्धिक और नैतिक दृष्टिकोण को रूप दिया। ​बाद में उन्हें पंजाब में सबसे चुनौतीपूर्ण असाइनमेंट के लिए चुना गया, जिसमें आतंकवाद के शिखर के दौरान डी.आई.जी., जालंधर रेंज (1985) के रूप में सेवा निभाना शामिल था। डीजीपी जम्मू-कश्मीर के रूप में उनके कार्यकाल को निम्नलिखित सुधारों के लिए याद किया जाता है: ​सीआईडी और खुफिया तंत्र को मजबूत करना। ​शुद्ध व्यावसायिकता, अनुशासन और ईमानदारी पर जोर। ​अधिकारियों की उन्नत ट्रेनिंग (राज्य के बाहर भी) ​नैतिकता और संयम पर आधारित लोक-केंद्रित दृष्टिकोण। ​डॉ. बेदी के अधीन सेवा करने वाले अधिकारियों की श्रद्धांजलि ​एस.एस. बिजराल, सेवानिवृत्त आई.जी.पी., जम्मू-कश्मीर पुलिस "डॉ. बी.एस. बेदी साहब एक ऐसे अधिकारी थे जिन्होंने एक कोमल दिल को बेमिसाल हिम्मत और ईमानदारी के साथ जोड़ा था। वह अपने विचारों को प्रकट करने में पूरी तरह पारदर्शी और निडर थे।" वे याद करते हैं कि 1992 में पुलवामा के दौरे के दौरान डॉ. बेदी ने मुस्कुराते हुए पंजाबी में कहा था: 'बिजराल तेरी ट्रांसफर तो होगी, लेकिन होगी बेदी की ट्रांसफर के बाद।' यह उनका अंदाज था हल्का मजाक, लेकिन गहरे विश्वास का संदेश। ​जे.पी. सिंह, पूर्व आई.जी.पी., जम्मू-कश्मीर पुलिस "मैं डॉ. बी.एस. बेदी साहब का बहुत सम्मान करता हूँ। वे न केवल एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी थे, बल्कि एक सच्चे नेक और ईमानदार इंसान थे। उनकी ईमानदारी संपूर्ण थी।" जे.पी. सिंह ने बताया कि डॉ. बेदी ने उत्तर प्रदेश में बड़े सांप्रदायिक दंगों को अपनी सूझबूझ और भीड़ के मनोविज्ञान की गहरी समझ से नियंत्रित किया था। ​मनमोहन सिंह, पूर्व डी.आई.जी. की यादों से "बेदी साहब केवल एक पुलिस अधिकारी नहीं, बल्कि एक विद्वान और संवेदनशील इंसान थे।" मनमोहन सिंह याद करते हैं कि 1993 में किश्तवाड़ में एक राजनीतिक नेता की हत्या के बाद जब स्थिति गंभीर हुई, तो बेदी साहब उनके साथ मजबूती से खड़े रहे और स्थिति को काबू में करने में मदद की। ​विद्वान और विचारक ​सेवानिवृत्ति के बाद, डॉ. बेदी ने उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के सदस्य के रूप में कार्य किया। उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में पीएचडी और डी.लिट (D.Litt.) की डिग्री प्राप्त की और वापस अध्यापन की ओर मुड़े। उनके जीवन का वर्णन उनकी बेटी प्रीति सिंह द्वारा लिखी गई पुस्तक 'A Life Uncommon: B.S. Bedi – The Incredible Journey of an I.P.S. Officer' में किया गया है। ​डॉ. बलबीर सिंह बेदी का निधन 25 जनवरी 2026 को हुआ वही तारीख जिस दिन उन्होंने 1992 में जम्मू-कश्मीर के डीजीपी का पद संभाला था। पुलिस मुख्यालय में डीजीपी श्री नलिन प्रभात और सभी रैंकों द्वारा उन्हें श्रद्धांजलि दी गई। ​डॉ. बी.एस. बेदी निडर नेतृत्व और ईमानदार पुलिसिंग का प्रतीक बने हुए हैं। उन्होंने वास्तव में एक असाधारण जीवन जिया ताकि दूसरे शांति से रह सकें। ​ईमेल: 1988amanjeetsingh@gmail.com ​