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मिडिल ईस्ट तनाव का असर फार्मा इंडस्ट्री पर गहराया
अशोक सहगल लुधियाना, 23 मार्च : मिडिल ईस्ट में ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव का असर अब दवा उद्योग पर भी साफ दिखाई देने लगा है। विशेषज्ञों के अनुसार, आने वाले दिनों में आम लोगों को दवाइयों के लिए ज्यादा कीमत चुकानी पड़ सकती है। पिछले दो हफ्तों में दवाओं के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल यानी एक्टिव फार्मा इंग्रीडिएंट्स (API) की कीमतों में करीब **25% तक उछाल** दर्ज किया गया है। आमतौर पर इस्तेमाल होने वाली पैरासिटामोल की कीमत भी लगभग 25% बढ़ चुकी है, जबकि अन्य दवाओं के रॉ मटेरियल में भी लगातार तेजी बनी हुई है। पंजाब होलसेल केमिस्ट एसोसिएशन के प्रधान सुरेंद्र दुग्गल और महासचिव जी.एस. चावला के मुताबिक, युद्ध के कारण यूरोप से आने वाली कच्चे माल की सप्लाई लगभग ठप हो गई है। हालांकि चीन से सप्लाई जारी है, लेकिन वहां से भी आपूर्ति प्रभावित हो रही है, जिससे घरेलू उत्पादन पर दबाव बढ़ गया है। स्थिति का सीधा असर कीमतों पर पड़ने की आशंका है। विशेषज्ञों का मानना है कि नई बैच में आने वाली दवाओं के दाम **15 से 20% तक बढ़ सकते हैं**। इसके अलावा, पेट्रोकेमिकल्स से बनने वाले फार्मा सॉल्वेंट्स की कीमतों में भी तेजी देखी जा रही है। युद्ध के चलते शिपिंग रूट प्रभावित हुए हैं, जिससे माल ढुलाई महंगी हो गई है। कई मामलों में फ्रेट चार्ज दोगुना हो चुका है और कंपनियों को हर शिपमेंट पर हजारों डॉलर अतिरिक्त खर्च करने पड़ रहे हैं। इस बढ़ती लागत के दबाव में फार्मास्यूटिकल कंपनियों ने सरकार से दवाओं की कीमतों में बढ़ोतरी की अनुमति देने की मांग की है। चूंकि भारत में दवाओं के दाम नियंत्रित रहते हैं, ऐसे में कंपनियों के लिए लागत का बोझ उठाना मुश्किल हो रहा है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि हालात जल्द नहीं सुधरे, तो न सिर्फ दवाइयों की कीमतें बढ़ेंगी, बल्कि आवश्यक और जीवनरक्षक दवाओं की उपलब्धता पर भी असर पड़ सकता है। यह संकट अब सिर्फ ऊर्जा या कच्चे तेल तक सीमित नहीं रहा, बल्कि देश की स्वास्थ्य सुरक्षा पर भी असर डालने लगा है।