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चंडीगढ़/यूटर्न/13 अप्रैल। दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आप प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने सोमवार को आरोप लगाया कि दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा, आरएसएस से जुड़े वकीलों के संगठन अधिवक्ता परिषद द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में चार बार शामिल हुईं। उन्होंने कहा कि वह बीजेपी-आरएसएस की विचारधारा के विरोधी हैं और दिल्ली शराब नीति मामले को राजनीतिक बताया। केजरीवाल ने मांग की है कि जस्टिस शर्मा को शराब नीति मामले से जुड़ी सीबीआई की याचिका की सुनवाई से हटा दिया जाए। उन्होंने दावा किया है कि उन्हें इस बात की गंभीर, वास्तविक और उचित आशंका है कि उनके सामने इस मामले की सुनवाई निष्पक्ष और तटस्थ नहीं होगी। केजरीवाल ने किए सवाल केजरीवाल ने कोर्ट में पेश होने पर कहा कि वकीलों का एक संगठन है, अधिवक्ता परिषद। यह बीजेपी और आरएसएस का वैचारिक संगठन है। आपकी (जज की) गरिमा इस संगठन के कार्यक्रमों में चार बार शामिल हुई है। जिस विचारधारा को ये लोग मानते हैं, हम उसका कड़ा विरोध करते हैं और हम खुले तौर पर इसका विरोध करते हैं। यह मामला राजनीतिक है। केजरीवाल ने अपनी दलील में राजनीतिक पूर्वाग्रह का आरोप लगाया और न्यायिक धारणा को लेकर चिंता जताई; उन्होंने सवाल उठाया कि क्या किसी विशेष विचारधारा से जुड़े कार्यक्रमों में शामिल होने से उनके मामले में निष्पक्षता पर असर पड़ सकता है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों का दिया हवाला सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों का हवाला देते हुए, उन्होंने इस बात का ज़िक्र किया कि एक काम कर रहे लोकतंत्र में, धारणा मायने रखती है। उन्होंने सीबीआई को "पिंजरे में बंद तोता" बताने वाली पिछली टिप्पणियों का भी हवाला दिया और तर्क दिया कि जांच एजेंसियों को अपनी स्वतंत्रता बनाए रखनी चाहिए और पूर्वाग्रह की धारणा को दूर करना चाहिए। उन्होंने आगे दावा किया कि कोर्ट ने खुद यह टिप्पणी की थी कि सीबीआई "राजनीतिक पूर्वाग्रह से प्रभावित" है। क्या मुझे न्याय मिलेगा ? केजरीवाल ने तर्क दिया कि यदि कोई जज किसी विशेष विचारधारा से जुड़े कार्यक्रमों में शामिल हुआ है, तो विरोधी विचारधारा से जुड़े किसी आरोपी को यह उचित आशंका हो सकती है कि उसे न्याय नहीं मिलेगा। उन्होंने सवाल पूछा, यदि मैं विरोधी विचारधारा से आता हूँ, तो क्या मुझे न्याय मिलेगा? उन्होंने विपक्षी नेताओं से जुड़े मामलों की सुनवाई में चुनिंदा तत्परता का भी आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि केवल केंद्र सरकार के राजनीतिक विरोधियों से जुड़े मामलों को ही तेज़ी से आगे बढ़ाया जा रहा है, और सुनवाई तथा फाइलिंग में अनावश्यक जल्दबाज़ी की जा रही है। ईडी व सीबीआई के तर्कों को किया स्वीकार दिल्ली शराब नीति मामले पर, आप प्रमुख ने दावा किया कि हाई कोर्ट ने ईडी और सीबीआई के तर्कों को काफी हद तक स्वीकार कर लिया है। उन्होंने कहा, ईडी और सीबीआई की हर प्रार्थना (मांग) एक फैसले में बदल गई है, सिवाय एक मामले के। केजरीवाल ने दलील दी कि वह एक आरोपी के तौर पर पेश नहीं हो रहे हैं, और कहा, मैं आज यहाँ एक आरोपी के तौर पर खड़ा नहीं हूँ। मुझे पहले ही बरी किया जा चुका है। पिछली कार्रवाई का किया जिक्र उन्होंने पिछली कार्यवाहियों का ज़िक्र किया, जिसमें 9 मार्च का आदेश भी शामिल था, और आरोप लगाया कि यह आदेश सीबीआई की मौजूदगी में एक संक्षिप्त सुनवाई के बाद पारित किया गया था। उन्होंने कहा, एकतरफ़ा, किसी की बात सुने बिना, किसी का जवाब लिए बिना। इस अदालत ने एक आदेश पारित करते हुए कहा कि, प्रथम दृष्टया, यह आदेश त्रुटिपूर्ण है। उन्होंने दावा किया कि निचली अदालत ने हज़ारों पन्नों की जाँच की थी, लेकिन एक छोटी सी सुनवाई के बाद उसके आदेश को पलट दिया गया। केजरीवाल ने आगे कहा कि सीबीआई का मामला मुख्य रूप से गवाहों के बयानों पर आधारित था, और दलील दी कि उनसे पूछताछ करना, प्रभावी रूप से निचली अदालत के आदेश को कमज़ोर करता है। दलीलों के बाद केजरीवाल ने मांगी अनुमति अपनी दलीलें पूरी करने के बाद केजरीवाल ने अदालत से जाने की अनुमति माँगी। न्यायाधीश ने उनकी दलीलों की सराहना करते हुए टिप्पणी की, आपने बहुत अच्छी दलीलें दीं। आप तो वकील भी बन सकते हैं। मुस्कुराते हुए जवाब देते हुए केजरीवाल ने कहा, धन्यवाद, मैम। मैं अभी जो काम कर रहा हूँ, उससे खुश हूँ। 6 अप्रैल की सुनवाई के दौरान, सीबीआई की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केजरीवाल की याचिका का विरोध करते हुए इसे बेबुनियाद बताया। सीबीआई ने भी इस याचिका के ख़िलाफ़ औपचारिक जवाब दाखिल किया था। ---