एक साल का मेयर, पाँच साल की जंग: चंडीगढ़ में सत्ता बनाम लोकतंत्र
चंडीगढ़।
चंडीगढ़ की नगर राजनीति को झकझोरते हुए सांसद मनीष तिवारी ने लोकसभा में एक अहम प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया है, जिसने केंद्र शासित प्रदेश में लोकतांत्रिक अधिकारों और प्रशासनिक नियंत्रण की नई बहस छेड़ दी है। बिल में सीधे चुने गए मेयर का पाँच साल का निश्चित कार्यकाल और यूटी एडमिनिस्ट्रेटर से चुनी हुई नगर निगम को प्रशासनिक शक्तियों के हस्तांतरण की मांग की गई है।
‘पंजाब म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन लॉ (एक्सटेंशन टू चंडीगढ़) अमेंडमेंट बिल, 2025’ मौजूदा एक साल के मेयर सिस्टम को समाप्त करने का प्रस्ताव करता है, जिसे तिवारी ने अस्थिरता, राजनीतिक सौदेबाज़ी और विकास कार्यों में बाधा का कारण बताया। प्रस्तावित कानून के तहत मेयर, सीनियर डिप्टी मेयर और डिप्टी मेयर का चुनाव सीधे जनता करेगी और वे पूरे निगम कार्यकाल तक पद पर रहेंगे।
बिल प्रशासनिक ढांचे में भी बड़ा बदलाव सुझाता है—मेयर-इन-काउंसिल प्रणाली, अधिकारियों पर निर्वाचित नेतृत्व का नियंत्रण और दलबदल विरोधी प्रावधान। हालांकि केंद्र सरकार की सहमति के बिना यह बिल संसद में लंबित है। बीजेपी का विरोध चंडीगढ़ में प्रशासनिक नियंत्रण कमजोर होने की आशंका से जुड़ा है।
यह बिल भले ही कानून न बना हो, लेकिन इसने चंडीगढ़ में सवाल खड़ा कर दिया है—सत्ता प्रशासन के पास रहे या जनता के चुने प्रतिनिधियों के पास?