प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को अपने एक्स हैंडल पर ‘सुभाषितम्’ के माध्यम से परोपकार और निःस्वार्थ सेवा का संदेश साझा किया। उन्होंने नदियों के निरंतर प्रवाह का उदाहरण देते हुए कहा कि मनुष्य को भी अपने सामर्थ्य का उपयोग दूसरों की भलाई के लिए करना चाहिए। संस्कृत श्लोक के जरिए उन्होंने सेवा, समर्पण और परोपकार की भावना को राष्ट्र निर्माण की महत्वपूर्ण शक्ति बताया।
नई दिल्ली (Naren Danu) : प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शुक्रवार सुबह सोशल मीडिया मंच एक्स पर संस्कृत के प्रेरक सुभाषित के जरिए निःस्वार्थ सेवा और परोपकार का संदेश दिया। उन्होंने नदियों के अविरल प्रवाह का उदाहरण देते हुए कहा कि मनुष्य को अपने सामर्थ्य और जीवन का उपयोग केवल अपने हित के लिए नहीं, बल्कि मानवता के कल्याण के लिए करना चाहिए।
प्रधानमंत्री ने संस्कृत श्लोक “जीवनं स्वं परार्थाय नित्यं यच्छत मानवाः। इति सन्देशमाख्यातुं समुद्रं यान्ति निम्नगाः॥” साझा किया। इसके माध्यम से उन्होंने बताया कि नदियां जिस तरह निरंतर बहते हुए दूसरों की प्यास बुझाती हैं और खेतों को सींचती हैं, उसी तरह मनुष्य को भी अपने जीवन को दूसरों की सेवा के लिए समर्पित करना चाहिए।
नदियां देती हैं निस्वार्थ सेवा का संदेश
श्लोक की व्याख्या करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि पहाड़ों से निकलने वाली नदियां बिना थके समुद्र की ओर बढ़ती रहती हैं। वे अपने जल का उपयोग स्वयं नहीं करतीं, बल्कि रास्ते में आने वाले जीव-जंतुओं और मनुष्यों की प्यास बुझाने के साथ कृषि भूमि को भी सिंचित करती हैं।
उन्होंने कहा कि नदियों का यह निरंतर प्रवाह मानव समाज के लिए एक मूक संदेश है। जिस प्रकार नदियां अपना सर्वस्व दूसरों के लिए समर्पित कर अंततः समुद्र में विलीन हो जाती हैं, उसी प्रकार मनुष्य को भी अपने जीवन को केवल स्वार्थ तक सीमित नहीं रखना चाहिए।
प्रधानमंत्री ने कहा कि निःस्वार्थ सेवा, समर्पण और परोपकार की भावना ही समाज को मजबूत करती है और राष्ट्र को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।